कानून की बालादस्ती || tyranny of law

    


     कानून की बालादस्ती 

    मक्का मुकर्रमा में फातिमा नाम की एक महिला थी, वह क़ुरैश की एक शाख बनू मख़्ज़ूम से ताल्लुक रखती थीं। ये लोगों से आरियतन सामान लेती और फिर वापस करने से इनकार कर देती। नीज़ वह लोगों का सामान और माल भी चुराया करती थीं। एक बार उसने चोरी की। जब मुकदमा रसूल अकरम स0अ0व0 की अदालत में पहुँचा, तो आपने उसके हाथ काटने का हुक्म जारी फरमाया। मख़्ज़ूमी महिला के हाथ काटे जाने का फैसला सुनकर क़ुरैश को बड़ी परेशानी लाहिक हुई क्यूंकि वह एक ऊँचे ख़ानदान की उला नस्ल वाली ख़ातून थीं। सरदारान क़ुरैश को ये फिक्र दामन-गीर हुई, कि इस मामले में रसूल अकरम स0अ0व0 से सिफारिश करने के लिए किस शख़्सियत का इंतिख़ाब किया जाए। गौर-ओ-फ़िक्र के बाद वे इस नतीजे पर पहुँचे कि इस मामले में रसूल अकरम स0अ0व0 से सिफारिश करने की जुर्रत उसामा बिन ज़ैद के सिवा किसी को नहीं हो सकती क्यूंकि वह रसूल अकरम स0अ0व0 के चहीते हैं।

इसी तरह सैय्यिदना उसामाह बिन ज़ैद रज़ि0 से सिफारिश के लिए दरख्वास्त की गई। उसामाह रज़ि0 ने इस महिला की सिफारिश के लिए रसूल अकरम स0अ0व0 से गुफ़्तगू की मगर उनकी बात सुन कर रंज और ग़ुस्से से रसूल अकरम स0अ0व0  के चेहरे का रंग बदल गया। आप स0अ0व0 ने फरमायाः-

    क्या तुम अल्लाह की हदूद में सिफारिश करते हो?

सैय्यिदना उसामाह बिन ज़ैद रज़ि0 बहुत परेशान हुए, अर्ज कियाः ऐ अल्लाह के रसूल! आप मेरी माफ़ी की दुआ फरमा दें।

जब शाम का वक़्त हुआ तो रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ख़ुतबा करने के लिए खड़े हुए और अल्लाह तआला की हम्द और सना के बाद फरमायाः-

अम्मा बाद! तुमसे पहले जो लोग गुज़रे हैं उनकी हलाकत का सबब यही है कि जब उनमें से कोई इज्ज़़त वाला आदमी चोरी का इर्तेकाब करता, तो उसे छोड़ देते (कानून का निफ़ाज़ नहीं करते थे) और जब कोई कमज़ोर आदमी चोरी का इर्तेकाब करता तो उस पर हद जारी करते थे। क़सम है उस ज़ात की, जिसके हाथ में मेरी जान है। अगर मुहम्मद स0अ0व0 की साहेबज़ादी फातिमा भी चोरी करती तो मैं उसका भी हाथ काट डालता।“

इसी तरह रसूल अकरम स0अ0व0 के हुक्म से इस ख़ातून का हाथ काट दिया गया।

सैय्यदा आइशा सिद्दीक़ा रज़ि0 का बयान

सैय्यिदा आइशा सिद्दीक़ा रज़ि0 का बयान है, कि फिर उस मख़्ज़ूमी महिला ने अपनी आदतें बदल लीं, सच्ची तौबा कर ली, और उसकी शादी हो गई। इसके बाद वह मेरे पास कभी-कभार आया करती थी, और मैं उसकी ज़रूरत रसूल अल्लाह स0अ0व0 को बतलाया करती थी। 

फ़ायदाः प्यारे बच्चो! पिछली क़ौमों में जब असर और रसूख और बड़े ख़ानदान वालों में से किसी से कोई ग़लती और गुनाह सरज़द होता था तो बादशाह वक़्त और हाकिम उसके ख़लिफ़ फ़ैसला नहीं करते थे बल्कि छोड़ देते थे। जब किसी ग़रीब से कोई गुनाह सरज़द होता था तो उसके ख़लिफ़ फ़ैसला किया जाता था। मोक़र्रर वाक़ेआ में बनू मख़ज़ूम की एक औरत ने चोरी की, जब उसके हाथ कटने की नौबत आई तो क़ुरैश को बड़ी परेशानी हुई कि किसी तरह उसको बचाया जाए। और उसके लिए उसामा बिन ज़ैद रज़ी अल्लाहु अन्हु से सिफ़ारिश कराई तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बहुत नाराज़ हुए और आपने फ़रमायाः अगर फ़ातिमा बिन्त मुहम्मद चोरी करती तो मैं उसके भी हाथ काटने का हुक्म सादिर कर देता। फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हुक्म से उस औरत का हाथ काटा गया। इस्लाम अदल व इन्साफ़ और मुसावात का मज़हब है, यहाँ पर हर एक के लिए एक ही हुक्म है। अमीर और ग़रीब के एतिबार से कोई फ़र्क़ नहीं है। इस लिए हमें अपनी ज़िन्दगी अदल व इन्साफ़ और मुसावात के साथ गुज़ारनी चाहिए ताकि हमारी ज़ात से किसी का नुक़सान न हो।

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