एहतरामे रमज़ान की बरकत से || Ehtram Ramzan ki Barkat se




एहतरामे_रमज़ान_की_बरकत_सेएक मुनाफ़िक़ (आतश परस्त) को जन्नत मिलीशहरे बुख़ारा में एक मज़ूसी (आग को पूजने वाला) रहता था ! एक मरतबा रमज़ान शरीफ मे वो अपने बेटे के साथ मुसलमानों के इलाके से गुज़र रहा था, उसके बेटे ने कोइ चीज़ अेहलानिया तौर पर ख़ानी शुरु कर दि! मज़ूसी ने जब यह देख़ा तो अपने बेटे को एक तमाचा मार दिया और ख़ुब डांटकर कहा, तुझे रमज़ान मुबारक के महिने मे मुसलमानों के इलाके मे ख़ाते हुए शर्म नहीं आती...??
लड़के ने जवाब दिया, अब्बा जान! आप भी तो रमज़ान शरीफ में ख़ाते हैं ! वालिद ने कहा, "ठ़ीक है मैं भी ख़ाता हूं मगर छुपकर अपने घर में ख़ाता हूं! मुसलमानों के सामने नहीं खाता! और माहे रमज़ान की बे-हुर्मती नहीं करता!"**********कुछ अरसे बाद उस शख़्स का इन्तकाल हो गया! किसी ने ख़्वाब मे उसको जन्नत में देख़ा तो उसे बडा ताज्ज़ुब हुआ, पूछा,
" तु तो मज़ूसी था! जन्नत में कैसे आ गया..?
कहने लगा, वाक्य मैं मज़ूसी था! लेकिन जब मौत का वक्त आया तो अल्लाह तआला ने एहतराम-ए- रमज़ान की बरक़त से मुझे ईमान की दौलत से नवाजा और मुझे जन्नत से सरफ़राज फ़रमाया"सुभान अल्लाह 


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