गुप्त
रोगों के कारण और इलाज – गुप्त रोग हमारे देश में कितनी तेजी से फैल रहा है
इसका पता इसी से लग जाता है कि आज के समय में हमारे देश में लगभग 5 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को गुप्त रोग है
यानि की हर 100 व्यक्तियों में से कम से
कम 10 व्यक्तियों को तो ये रोग
होता ही है। यौन रोग के ज्यादातर रोगी लगभग 15 से 30 साल तक के होते हैं और
उनमे सबसे ज्यादा भयंकर यौन रोग जो कि सिफलिस नामक रोग होता है उसके
रोगी सबसे ज्यादा होते हैं।
जो
लोग कम पढ़े लिखे होते हैं उनको तो यौन-क्रियाओं के बारे मे कुछ ज्यादा पता नहीं
होता इसी कारण से उनमे ये रोग फैलता है। लेकिन जो पढ़े लिखे लोग होते हैं वे टी.वी, फिल्मों आदि को देखकर सैक्स के प्रति बढ़ती
रूचि के कारण या नशे आदि में पड़ने के कारण भी इस रोग को बढ़ा लेते हैं। इसलिए
यौनरोगों के बारे में जानकारी होना बहुत जरूरी है कि ये रोग क्यों होते हैं, कैसे होते हैं और इनकी रोकथाम किस तरह होती
है।
यौन
रोग को बहुत ही गन्दा रोग माना जाता है क्योंकि अक्सर ये गलत सम्बंधों के कारण
फैलता है इसलिए अगर किसी भी व्यक्ति को ये रोग होता है तो वो शर्म या डर के मारे
किसी को भी बताने से हिचकिचाता है तथा इसी कारण से वो इस रोग का इलाज करवाने मे भी
डरता है जिसके कारण ये रोग बढ़ता ही जाता है।
जरूरी
नहीं है कि यौनरोग गलत तरह के लोगों से संबध बनाने से ही फैलता है बल्कि यौन
रोगियों के सिर्फ संपर्क से ही या उनके कपड़ों आदि को छूने से भी फैल सकते हैं।
यौनरोग मुख्यत: 3 तरह के होते हैं- मेजर, (बड़े), माइनर
(छोटे) और मिसलेनियस (खतरनाक रोग)। माइनर (छोटे) और मिसलेनियस यौन रोगियों के
शारीरिक संपर्क में आने से, उसके कपड़ों को छूने से या
यौन संसर्ग तीनों तरह से।
बड़ी बीमारियां – Big ailments
- सिफलिस
(आतशक)
- गनोरिया(सूजाक)।
मिसलेनियस बीमारियां – Misslenius Diseases
- मोनीलिया
- भलुस्क्कम
कंटैजियोसम
- स्केवीज
याखुजली
छोटी बीमारियां – Small ailments
- शैकरायड
- लिफोग्रेनूलोमा
वैनीरियम
- ग्रेन्लोमा
वैनीरियम और इनावायनेल
- ट्राइकोमोनल
इन्फेक्शन
- हरपीज
प्रोजैनिटैलिस
चिकित्सा – Treatment
आतशक या सिफलिस – आतशक रोग हमारे भारत में
सबसे ज्यादा लोगों में पाया जाता है ये रोग क्यों होता है और इसके लक्षण क्या है
इसके बारे में पता लगाना बहुत जरूरी है। एक `आरगैनिज्म
होता है `ट्रिपोनिमा पेलीडम´। यह इतना बारीक होता है कि आंख से भी दिखाई नहीं देता। संभोगक्रिया करने के बाद 9 दिन
से लेकर लगभग 40 साल के अन्दर ये रोग पैदा
हो सकता है। इसी वजह से जब इस बीमारी के लक्षण सामने आते हैं तो इसके कारणों को
पता लगाना मुश्किल होता है। इसके लक्षण भी शुरुआत में ठीक से प्रकट नहीं होते तो
ये रोग किसी को कभी भी अंजाने में तो कभी उपेक्षा से बढ़ता रहता है।
इस
रोग में शुरु में योनि या लिंग पर एक छोटा सा दाना निकलता
है इसमे किसी तरह का दर्द नहीं होता है पर जब लापरवाही के कारण ये रोग बढ़ जाता है
तो कुछ ही हफ्तों में ये दाने सारे शरीर में फैलने लगते हैं। ये दाने थोड़े या
ज्यादा हो सकते हैं। मुंह में छाले भी हो सकते हैं। बगल में, गले पर, नलियों
में गांठे सी हो सकती है। कभी-कभी तो ये रोग सिर्फ खून में ही रहता है और इससे कोई
परेशानी भी नहीं होती। इसे `लेटेंट सिफलिस´ कहते हैं लेकिन जब स्त्री गर्भवती होती है तो
होने वाले बच्चे पर इसका बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए अस्पतालों में गर्भवती स्त्री
को रोजाना जांच करवाने की सलाह दी जाती है ताकि समय पर सिफलिस का इलाज करा लिया
जाए और बच्चा बिल्कुल स्वस्थ पैदा हो।
वैसे
तो स्त्री के गर्भवती होने के बाद ये रोग अपने आप ही कम होता रहता है लेकिन मां और
होने वाले बच्चे पर इसका बुरा असर पड़ता है। जिस स्त्री को ये रोग होता है उसको गर्भ ठहरने पर पहली बार में जल्दी गर्भपात हो जाता है, दूसरी बार गर्भ ठहरने पर भी गर्भपात होता है
पर 4-5 महीनों के बाद। तीसरी बार
पूरे समय तक गर्भपात नहीं होता पर बच्चा पैदा होते समय मर सकता है
पर चौथी बार बच्चा जीवित रह सकता है पर बच्चे को ये रोग पैदा होने के साथ ही होता
है। पैदा होने वाले जिस बच्चे को ये रोग `कंजेनिटल
सिफलिस´ होता है उसकी नाक हमेशा
बहती रहती है।
उसके
सारे शरीर पर दाने और छाले निकल जाते हैं, जोड़
सूज जाते हैं। ऐसे बच्चों को बहुत से मामलों में बचाया तो जा सकता है पर इनके बचने
की संभावना बहुत कम होती है। हां अगर स्त्री अपना इलाज सही तरीके से और पहले ही
करा लें तो अगला बच्चा ठीक तरह से जिन्दगी जी सकता है। इसलिए स्त्री को गर्भ ठहरते
ही सावधानी बरतनी चाहिए। अस्पतालों में हर गर्भवती स्त्री के खून की जांच की जाती
है और अगर उसके खून में कोई रोग पाया जाता है तो उसका इलाज किया जाता है जिससे
बच्चा बिल्कुल स्वस्थ पैदा होता है। पर स्त्री के अन्दर अगर रोग बढ़ा हुआ हो तो इस
हालत में कुछ महीनों के बाद या बड़े होने पर बच्चे को भी वही रोग होता है। इस रोग
का बच्चे के दिमाग पर भी बुरा असर पड़ सकता है और उसकी आंखों की रोशनी भी जा सकती है।
अगर
सिफलिस रोग की शुरूआत मे ही इलाज करवा लिया जाए तो इतने भयंकर हालात नहीं होते।
बहुत ही कम मामलों मे सिफलिस का रोग दोबारा होता है। पर रोगी इस बारे मे ध्यान
नहीं रखते और रोग बढ़ता ही जाता है। इस रोग को रोकने के लिए जरूरी है कि रोग के
होने के शुरूआती 2 साल में ही इसका इलाज करा
लिया जाए।
एक
बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि रोग चाहे किसी एक को क्यों न हो इलाज
पति-पत्नी दोनों को ही करवाना जरूरी है नहीं तो अगर कोई एक ठीक हो जाता है तो फिर
दूसरे से ये रोग दोबारा लग सकता है। इसके लिए समय-समय पर खून की जांच करवाते रहना
चाहिए। इस रोग मे लगभग 2 साल तक डॉक्टर के कहे
अनुसार चलना जरूरी होता है अगर रोग कुछ ज्यादा बढ़ा हो तो ज्यादा समय भी लग सकता
है। लड़कों का जब तक खून साफ ना हो जाए पूरी तरह तब तक शादी से दूर ही रहना चाहिए।
इसका इलाज मुश्किल नहीं।
शुरू
मे पहले दिन 2 इंजेक्शन पीछे कूल्हे पर
दिये जाते हैं या लगभग 10 दिन तक 1-1 इंजेक्शन रोज। अगर दवाई खाने से एलर्जी होती है तो इसका इलाज किया जाता है। शुरू मे अगर इस रोग को
इलाज करा लिया जाए तो अच्छा है नहीं तो रोग पुराना होने पर इसका बुरा असर शरीर की
हडि्डयों और दिल-दिमाग पर भी पड़ सकता है।
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सूजाक
(गिनोरिया) – सूजाक रोग एक बैक्टीरिया
या जीवाणु से फैलता है जिसका नाम होता है `नाइसीरिया
गिनोरिए´। पुरूषों के अन्दर सूजाक
रोग के मामले सबसे ज्यादा खतरनाक होते हैं और इसमे उन्हें परेशानी भी ज्यादा होती
है। स्त्रियों में यह रोग कम परेशानी वाला होता है पर इस रोग को फैलाने में उनका
हिस्सा पुरूषों से ज्यादा है। इस रोग को कोई लक्षण न होने पर भी गलत औरतों द्वारा
ये रोग पुरूषों में फैलाया जाता है और फिर उनके द्वारा ये रोग घर की स्त्रियों में
फैल जाता है। इसलिए स्त्रियों को इस रोग
के लिए `हेल्दी कैरियर्स´ या बीमारी फैलाने वाली स्वस्थ स्त्रियां कहा
जाता है।
इस
रोग के फैलने का समय कम है। संभोग क्रिया के 2 से
5 दिन के अन्दर ही इस रोग के लक्षण सामने आ
जाते हैं। इस रोग में शुरूआत मे पेशाब मे जलन होती है और फिर पेशाब मे मवाद आने लगता है।
अगर 1 सप्ताह के अन्दर ही इसकी
चिकित्सा ना कराई जाए तो पेशाब की पूरी नली में इससे परेशानी हो सकती है तथा
अण्डकोष मे भी। इस रोग मे दर्द बहुत ज्यादा और ना सहने वाला होता है। अगर इस रोग
का इलाज जल्दी ना कराया जाए तो रोगी के जोड़ों मे सूजन, हडि्डयों
को टेढ़ा होना, आंखें कमजोर जैसे लक्षण
पैदा हो जाते हैं।
स्त्रियों
को अगर सुजाक रोग हो तो उन्हे परेशानियां तो कम होती पर उनके मां बनने की ताकत कम
हो सकती है। कभी-कभी पानी योनि मे से पानी जाने लगता है और जलन पैदा होने लगती है।
रोग के ज्यादा बढ़ जाने पर स्त्री के पेट मे सूजन भी आ सकती है लेकिन इलाज स्त्री और पुरूष दोनों को साथ ही
होना चाहिए। इसके लिए 2-3 महीने तक डॉक्टर के कहे
अनुसार चलना जरूरी होता है। पुरूषों को 2 दिन
तक इंजेक्शन लगवाने पड़ते हैं और स्त्रियों को 4 दिन
तक इंजैक्शन लगवाने पड़ते हैं।
शैकरायड
– शैकरायड रोग के कीटाणु का
नाम है `इक्रीबेसिला´ और इसके फैलने का समय है 3 से 5 दिन।
इसमे पहले बाहरी काग पर एक जख्म सा बन जाता है जिसके अन्दर से खून भी निकलता
है और उसमे दर्द भी होता है। 2-3 हफ्तों के बाद नलियों में
गांठे सी पड़ने लग जाती है। अगर इस समय के बाद भी इस रोग की चिकित्सा मे लापरवाही
की जाए तो थोड़े समय के बाद इन गांठों के अन्दर मवाद पड़ने लगती है। एक बात जाननी भी
जरूरी है कि खून खराब सिर्फ सिफलिस रोग मे ही होता है बाकी रोगों मे नहीं। इसलिए सूजाक
रोग में पेनीसिलीन इंजैक्शन से और शेकरायड में सलफा दवाइयों से रोग को काबू मे रखा
जाता है। पर इन दवाओं को बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं लेना चाहिए। अपने आप दवा या
कम ज्यादा खुराक लेना ठीक नहीं है। शेकरायड रोग में जल्दी इलाज कराने से ये रोग
बहुत जल्दी ठीक हो जाता है।
लिफोग्रेन्लोमा
वैनीरियम – लिफोग्रेन्लोमा वैनीरियम
नामक यौन रोग संभोग करने के 7 से 21 दिन के बीच मे कभी भी हो सकता है। इस रोग मे
योनि या लिंग पर बिल्कुल छोटा सा दाना सा निकलता है जो शुरू मे होता है तो कुछ पता
नहीं चलता और कुछ घंटे के बाद अपने आप ठीक हो जाता है लेकिन इसके 2-3 सप्ताह के बाद टांग के जोड़ों में गांठे सी
बनने लगती है तथा जोड़ों मे दर्द होने लगता है। रोगी को हल्का बुखार और कमजोरी भी आ सकती है। अगर इसका तुरन्त ही इलाज ना
कराया जाए तो 1-2 सप्ताह के बाद ये गांठे
फूलने लगती है तथा फिर उनमे मवाद पड़ने लगता है। इसके बाद जब ये गांठे फूटती है तो
उनके बहुत सारे मुंह खुल जाते हैं। शैकरायड´ की
गांठों और लिफोग्रेन्लोमा वैनीरियम की गांठों में यही फर्क है कि शैकरायड´ की गांठ का सिर्फ एक ही मुंह खुलता है और
लिफोग्रेन्लोमा वैनीरियम की गांठ के बहुत सारे।
अगर
इसके बाद भी इनका इलाज ना कराया जाए तो ये गांठे नासूर का रूप ले लेती है जिनके
अन्दर से कभी भी मवाद आने लगता है तो कभी भी बन्द हो जाता है। स्त्री की योनि या
पुरूष के लिंग पर सूजन आ जाती है और भगन्दर रोग हो सकता है। इस रोग के कारण मल-मूत्र का रास्ता एक ही हो
जाता है और पेशाब योनि मे से आने लगता है। रोगी को हमेशा पेशाब करते समय परेशानी
महसूस होती है और हर समय बूंद-बूंद करके पेशाब टपकता रहता है। इसलिए गांठ बनते ही
डॉक्टर के पास जाकर जांच करवा लेनी चाहिए। रोग की शुरूआत मे 15-20 दिन तक इलाज करवाने से रोग पर पूरी तरह काबू
पाया जा सकता है। अगर रोग पुराना हो जाता है तो इसके कई छोटे-छोटे ऑप्रेशन भी
कराने पड़ सकते हैं।
ग्रेन्लोमा
वैनीरियम – ग्रेन्लोमा वैनीरियम नामक
रोग एक कीटाणु से पैदा होता है। अक्सर ये रोग जीर्ण रूप में चलता रहता है और बड़ी
ही मुश्किल से ठीक होता है। इस रोग के फैलने का समय संभोग-क्रिया के कुछ महीनों से
लेकर 2 साल तक हो सकता है। इस रोग
में पहले लाल रंग का एक जख्म पैदा होता है जो कुछ समय मे चारों ओर फैलने लगता है
और बड़ी ही मुश्किल से ठीक होता है। अगर इस जख्म का शुरू मे ही इलाज करा लिया जाए
तो अच्छा है नहीं तो ये एक मांस के लोथड़े के रूप मे बड़ा होने लगता है। इसके बाद
निष्क्रमण के छेद बन्द होने लगते हैं और पेशाब तथा मासिकधर्म का आना बन्द हो सकता है।
बच्चे
के जन्म के समय बच्चेदानी का मुंह ना खुलने के कारण बच्चे के जन्म में भी बहुत
परेशानी हो सकती है। रोगी के नीचे के हिस्से (जनन अंग) मे सूजन भी आ सकती है। इसका
इलाज बहुत लंबा चलता है और ऑप्रेशन भी कराना पड़ सकता है। इसलिए इस रोग को बढ़ने ना
दिया जाए। रोग की ‘शुरूआत में ही इलाज कराने
से `स्ट्रैप्टोमाइसिन´ इंजैक्शनों से 2-3 हफ्तों में ही ये रोग ठीक हो सकता है।
ट्राइकोमोनस
इन्फैक्शन – इस रोग में योनि मे से ल्यूकोरिया (श्वेत प्रदर) की तरह पानी निकलता रहता है पर इस पानी में
मवाद आता है और ये पीले रंग का होता है। इसमे योनि के स्थान पर खुजली होने लगती है
तथा रोग के बढ़ने पर जलन भी होती है। पुरुषों को ये रोग होने पर लिंग पर खुजली होती
है तथा पेशाब के साथ पीला सा तरल पदार्थ आता है। रोग पति या पत्नी किसी को भी हो
पर इलाज दोनों का ही साथ मे होना चाहिए। रोग की शुरूआत में इलाज कराने से सिर्फ 7 दिनों मे ही इस रोग को ठीक किया जा सकता है।
रोग के ज्यादा बढ़ने पर इलाज कुछ लंबा चल सकता है पर इलाज के बाद इसका शरीर पर कुछ
बुरा असर नहीं रह जाता।
हरपीज
प्रोजैनिटैलिस – हरपीज प्रोजैनिटैलिस नामक
रोग संभोगक्रिया करने के कुछ हफ्तों के अन्दर ही एक वायरस इन्फेक्शन´ या जीवाणु के द्वारा प्रकट होता है। इस रोग
में स्त्री की योनि या पुरूष के लिंग में छाले से निकल आते हैं। इनके थोड़े से बढ़ने
पर इनके अन्दर पानी भर जाता है और खुद ही फूटकर निकल जाता है। इनमे कभी दर्द होता
है, कभी नहीं। ये छाले वैसे तो अपने आप ठीक हो
जाते हैं पर थोड़े दिनों के बाद अपने आप दुबारा आ जाते हैं। इसलिए इन छालों के होते
ही इनकी जांच करा लेनी चाहिए ताकि इनको बढ़ने से रोका जा सकें।
इस
रोग के लक्षणों के आधार पर `एंटीबायटिक´ दवाओं से इस रोग को काबू मे किया जा सकता है।
इस बीमारी को जड़ से खत्म करने मे डॉक्टर अभी पूरी तरह से सफल नहीं हुए है लेकिन
अगर जल्दी इस रोग का इलाज ना कराया जाए तो इससे दूसरे रोग फैलने का डर रहता है।
इसलिए रोग की शुरूआत में इसका इलाज करवाना जरूरी है ताकि अगर रोग पूरी तरह से ठीक
न हो पाए तो भी ये काबू मे तो रहे और आगे न बढ़ पाए।
एड्स
– एड्स एक वायरल इंफेक्शन है। एड्स का रोग एड्स के
रोगी के साथ असुरक्षित यौन सम्बंध बनाने से, एड्स
से पीड़ित मां के गर्भ में बच्चे को हो जाता है। इसमे शरीर पर अलग-अलग तरह के रोग
पैदा हो जाते हैं, क्योंकि इस रोग के रोगी की
बीमारियों से लड़ने की शक्ति जो होती है वो बिल्कुल खत्म सी ही हो जाती है। इस रोग
को पूरी तरह से समाप्त करने का इलाज अभी सम्भव नहीं हो पाया है।
स्केवीज
– स्केवीज रोग या खुजली का
रोग भी संभोग करने या रोगी व्यक्ति के कपड़ों आदि के छूने से हो जाता है। इस रोग के
कीटाणु चमड़ी के अन्दर जम-जूं की तरह होते हैं और ऊपर की परतों में रहते हैं। ऊपर
केवल उभरी हुई सी नसें ही दिखाई पड़ती है। इस कीटाणु के अण्डे रोगी व्यक्ति के
कपड़ों से चिपके हुए रहते हैं। वहीं से लगकर बढ़ते हुए ये त्वचा में पहुंच जाते हैं।
ये रोग इतना फैलने वाला है कि घर मे अगर एक को हो तो बाकी सभी को लग जाता है तथा
आस-पड़ोस के लोगों मे भी फैलने लगता है। इस रोग का इलाज बहुत ही आसान है।
इसमे
रोगी को एक प्रकार का सफेद रंग का तेल दिया जाता है, जिसे
2-3 दिन तक दिन मे कम से कम 3 बार लगाना पड़ता है। घर के सारे सदस्यों का
इलाज एक ही साथ करना चाहिए, नहीं तो किसी भी व्यक्ति
मे इसका कीटाणु रह गया तो ये रोग फिर दुबारा से लौट सकता है। इस तेल को लगाने के
बाद 2-3 दिन तक नहाना नहीं चाहिए।
इसके बाद सारे कपड़े, बिस्तर, तोलिए आदि को गर्म पानी में उबालकर एक ही साथ
धो देना चाहिए।
मोनीलिया
– मोनीलिया रोग को फैलने के
लिए कपड़ों आदि के छूने की भी जरूरत नहीं होती। ये रोग अक्सर योनि के अन्दर ही पैदा
हो जाता है। इस रोग में योनि में से सफेद गाढ़ा सा पानी निकलता है और योनि मे खुजली सी होने लगती है। ये रोग ज्यादातर स्त्री के गर्भकाल के समय
होता है पर रोग होने के 10 दिन के अन्दर ही योनि में 1 गोली रखने से ठीक हो जाता है। पुरूषों को ये
रोग न के बराबर ही होता है।
मलुस्कम
कंटेजियोसम – मलुस्कम कंटेजियोसम रोग एक वायरस के
द्वारा होता है। इसमे योनि पर सफेद से दाने निकल आते हैं जो कुछ समय के बाद पूरे
शरीर पर भी हो सकते हैं। इन दानों में सफेद गाढ़ा सा पदार्थ भरा हुआ होता है जो
दबाने से फूट पड़ता है और बाहर निकल जाता है। इसका इलाज सिर्फ अस्पताल मे ही हो सकता
है क्योंकि इन दानों को एसिड से जलाया जाता है इसलिए घर पर इनका इलाज असम्भव ही
है। इसका इलाज पति-पत्नी दोनों को कराने की जरूरत नहीं है सिर्फ जिस व्यक्ति को ये
रोग हो उसे ही कराने की जरूरत पड़ती है। इन दानों पर 1-2 सप्ताह तक रोजाना 2-3 बार दवा लगवाने से ये रोग ठीक हो जाता
है।
स्केवीज
– स्केवीज रोग या खुजली का
रोग भी संभोग करने या रोगी व्यक्ति के कपड़ों आदि के छूने से हो जाता है। इस रोग के
कीटाणु चमड़ी के अन्दर जम-जूं की तरह होते हैं और ऊपर की परतों में रहते हैं। ऊपर
केवल उभरी हुई सी नसें ही दिखाई पड़ती है। इस कीटाणु के अण्डे रोगी व्यक्ति के
कपड़ों से चिपके हुए रहते हैं। वहीं से लगकर बढ़ते हुए ये त्वचा में पहुंच जाते हैं।
ये रोग इतना फैलने वाला है कि घर मे अगर एक को हो तो बाकी सभी को लग जाता है तथा
आस-पड़ोस के लोगों मे भी फैलने लगता है। इस रोग का इलाज बहुत ही आसान है।
इसमे
रोगी को एक प्रकार का सफेद रंग का तेल दिया जाता है, जिसे
2-3 दिन तक दिन मे कम से कम 3 बार लगाना पड़ता है। घर के सारे सदस्यों का
इलाज एक ही साथ करना चाहिए, नहीं तो किसी भी व्यक्ति
मे इसका कीटाणु रह गया तो ये रोग फिर दुबारा से लौट सकता है। इस तेल को लगाने के
बाद 2-3 दिन तक नहाना नहीं चाहिए।
इसके बाद सारे कपड़े, बिस्तर, तोलिए आदि को गर्म पानी में उबालकर एक ही साथ
धो देना चाहिए।

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