हैं किसी की यह करम फर्माइयाँ, बज रही हैँ ज़ेहन मेँ शहनाइयाँ

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हैं किसी की यह करम फर्माइयाँ
हैं किसी की यह करम फर्माइयाँ
बज रही हैँ ज़ेहन मेँ शहनाइयाँ

उसका आना एक फ़ाले नेक है
ज़िंदगी में हैं मेरी रानाइयाँ

मुर्तइश हो जाता है तारे वजूद
जिस घड़ी लेता है वह अंगडाइयाँ

उसकी चशमे नीलगूँ है ऐसी झील
जिसकी ला महदूद हैं गहराइयाँ

चाहता है दिल यह उसमें डूब जाएँ
दिलनशीं हैं ये ख़याल आराइयाँ

मेरे पहलू में नहीं होता वह जब
होती हैं सब्र आज़मा तन्हाइयाँ

तल्ख़ हो जाती है मेरी ज़िंदगी
करती हैं वहशतज़दा परछाइयाँ

इश्क़ है सूदो ज़ियाँ से बेनेयाज़
इश्क़ मे पुरकैफ़ हैँ रुसवाइयाँ

~डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी

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दिल ने चाहा बहुत पर मिला कुछ नहीं

दिल ने चाहा बहुत पर मिला कुछ नहीं
ज़िन्दगी हसरतों के सिवा कुछ नहीं

उसने रुसवा सरेआम मुझको किया
उसके बारे में मैंने कहा कुछ नहीं

इश्क़ ने हमको सौग़ात में क्या दिया
ज़ख़्म ऐसे कि जिनकी दवा कुछ नहीं

पढ़के देखीं किताबें मोहब्बत की सब
आँसुओं के अलावा लिखा कुछ नहीं

हर ख़ुशी मिल भी जाए तो क्या फ़ायदा
ग़म अगर न मिले तो मज़ा कुछ नहीं

ज़िन्दगी ये बता तुझसे कैसे मिलें

जीने वालों को तेरा पता कुछ नहीं

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